“आत्मसम्मान”

एक बार एक नदी थी, बहुत चंचल और शांत थी, कभी इस तो कभी उस किनारे पे झूलती थी, किनारा उसे कुछ भी सुना देता था, तो वो कुछ समेटे और कुछ बखेरते निकल लेती थी, बूंदों को उसकी ये बात अच्छी न लगती थी, और बूंदों मैं नदी की जान बसती थी,  एक समय … Continue reading “आत्मसम्मान”