खामोश!

किसी ने कहा था कि, उडता हुआ पंछी है तू, पिंजरे में न बंध पाएगा। किसी ने कहा था कि, नदी के नीर सा है तू, किसी किनारे पे न रुक पाएगा। आज उस किसी से, कहना चाहता हूँ, मैं कि, मुझे मेरा नीला गगन मिल गया, उस मे, मुझे मेरा विशाल समंदर मिल गया, … Continue reading खामोश!